July 3, 2026 2:22 am

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CG News: छत्तीसगढ़ के जंगलों का अनमोल खजाना, आखिर क्यों हजार रुपये किलो तक बिकते हैं बोड़ा, फुटू और खेकसी?

CG News: छत्तीसगढ़ के जंगलों का अनमोल खजाना, आखिर क्यों हजार रुपये किलो तक बिकते हैं बोड़ा, फुटू और खेकसी?
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CG News: छत्तीसगढ़ के जंगलों का अनमोल खजाना, आखिर क्यों हजार रुपये किलो तक बिकते हैं बोड़ा, फुटू और खेकसी?

CG News: मानसून की पहली तेज बारिश होते ही छत्तीसगढ़ के जंगलों की तस्वीर बदल जाती है, सूखी जमीन पर हरियाली लौटने के साथ जंगल ऐसी दुर्लभ वन उपज देने लगते हैं, जिसका लोग पूरे साल इंतजार करते हैं, इन दिनों बोड़ा, खेकसी और जल्द आने वाले फुटू की चर्चा सबसे ज्यादा है, इनकी कीमत 500 रुपये से लेकर 1000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में इनकी मांग कम नहीं होती, आखिर इन जंगलों की मौसमी सब्जियों में ऐसा क्या खास है कि, लोग महंगे दाम चुकाकर भी इन्हें खरीदना पसंद करते हैं? आइए जानते हैं इनके पीछे छिपा वैज्ञानिक, पारंपरिक और आर्थिक सच.

मानसून के साथ लौटता है जंगलों का स्वाद

छत्तीसगढ़ में बारिश केवल मौसम नहीं बदलती, बल्कि जंगलों की जैव विविधता को भी नई जिंदगी देती है, जैसे ही लगातार बारिश होती है, मिट्टी में नमी बढ़ती है और वन क्षेत्रों में कई प्राकृतिक खाद्य पदार्थ अपने आप उगने लगते हैं, इन्हीं में बोड़ा, फुटू और खेकसी सबसे लोकप्रिय वन उपज हैं, इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें किसान खेतों में नहीं उगाते, बल्कि ये पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों में विकसित होती हैं, इसलिए इनकी उपलब्धता कुछ ही सप्ताह तक रहती है और बाजार में इनकी कीमत लगातार ऊंची बनी रहती है.

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बोड़ा: जंगल का सफेद सोना

बोड़ा छत्तीसगढ़ के जंगलों में मिलने वाला एक खाद्य जंगली मशरूम है, यह मानसून के दौरान नम मिट्टी और जैविक पदार्थों से भरपूर वनभूमि में प्राकृतिक रूप से उगता है, धमतरी, बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, गरियाबंद और नारायणपुर के जंगलों में इसकी सबसे अधिक आवक होती है, स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी परिवार सुबह-सुबह जंगलों में जाकर इसका संग्रह करते हैं और फिर स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, सीमित उपलब्धता और बेहतरीन स्वाद के कारण इसकी कीमत कई बार 1000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है.
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार खाद्य जंगली मशरूम प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-बी समूह, पोटैशियम, आयरन और कई सूक्ष्म पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माने जाते हैं, हालांकि विभिन्न प्रजातियों में पोषण की मात्रा अलग-अलग हो सकती है.

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खेकसी: बारिश में मिलने वाली दुर्लभ वन सब्जी

खेकसी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक मौसमी वन सब्जियों में शामिल है, यह एक प्राकृतिक बेल पर लगने वाली सब्जी है, जो केवल मानसून के दौरान कुछ सप्ताह के लिए ही उपलब्ध होती है, धमतरी, गरियाबंद, कांकेर और बस्तर के वन क्षेत्रों से इसे स्थानीय बाजारों तक लाया जाता है.
इसका स्वाद सामान्य सब्जियों से अलग होता है और इसे मसालेदार सब्जी या पारंपरिक व्यंजनों के रूप में बनाया जाता है, स्थानीय लोगों के अनुसार यह हल्की और सुपाच्य मानी जाती है, सीमित उपलब्धता के कारण इसकी कीमत भी 500 से 700 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है.

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फुटू: जिसका इंतजार पूरे साल रहता है

फुटू भी एक जंगली खाद्य मशरूम है, लेकिन इसकी उपलब्धता बोड़ा से भी कम होती है, अच्छी बारिश, पर्याप्त नमी और अनुकूल प्राकृतिक वातावरण मिलने के बाद ही यह जंगलों में निकलता है, स्थानीय लोगों का मानना है कि तेज बारिश और गर्जना के कुछ दिनों बाद फुटू दिखाई देना शुरू हो जाता है.
छत्तीसगढ़ में इसे विशेष मौसमी व्यंजन माना जाता है, इसकी मांग इतनी अधिक रहती है कि बाजार में आते ही कुछ घंटों में पूरा स्टॉक बिक जाता है, कई बार इसकी कीमत 800 से 1000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है.

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छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं हैं ये वन उपज

हालांकि बोड़ा, फुटू और खेकसी को छत्तीसगढ़ की पहचान माना जाता है, लेकिन ये केवल यहीं नहीं मिलते, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के जंगलों में भी इनकी अलग-अलग प्रजातियां प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं, विभिन्न राज्यों और जनजातीय समुदायों में इनके स्थानीय नाम बदल जाते हैं, झारखंड के कई इलाकों में बोड़ा और फुटू जैसी जंगली मशरूम प्रजातियों को रुगड़ा या फुटका कहा जाता है, जबकि ओडिशा में इन्हें स्थानीय जनजातीय नामों से जाना जाता है, खेकसी का भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नाम प्रचलित है.

कैसे की जाती है इनकी खेती?

बोड़ा और फुटू की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इनकी सामान्य खेती नहीं की जा सकती, ये फफूंद के सूक्ष्म बीजाणुओं यानी स्पोर्स से जंगलों की मिट्टी में प्राकृतिक रूप से विकसित होते हैं, इनके लिए साल के जंगल, जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी, लगातार नमी और विशेष तापमान की आवश्यकता होती है, वैज्ञानिक कई वर्षों से इनकी व्यावसायिक खेती पर शोध कर रहे हैं, लेकिन अभी तक सामान्य किसानों के लिए सफल तकनीक विकसित नहीं हो सकी है.
वहीं खेकसी एक मौसमी वन बेल है, कुछ ग्रामीण इसे खेतों की मेड़ों या घरों के आसपास बीजों से उगाने का प्रयास करते हैं, लेकिन आज भी इसकी अधिकांश उपलब्धता जंगलों से ही होती है.

आखिर इतनी महंगी क्यों होती हैं ये सब्जियां?

इन वन उपजों की ऊंची कीमत के पीछे सबसे बड़ा कारण इनकी दुर्लभता है, ये पूरे साल नहीं मिलतीं, बल्कि केवल मानसून के सीमित समय में ही उपलब्ध होती हैं, इन्हें खोजने के लिए ग्रामीणों को कई किलोमीटर तक जंगलों में पैदल चलना पड़ता है, कई बार पूरे दिन की मेहनत के बाद भी बहुत कम मात्रा में बोड़ा या फुटू मिलता है, यही सीमित उपलब्धता, कठिन संग्रह प्रक्रिया और भारी मांग इन्हें बाजार की सबसे महंगी मौसमी वन उपज बना देती है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी

बोड़ा, फुटू और खेकसी केवल स्वाद का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि हजारों आदिवासी और ग्रामीण परिवारों की अतिरिक्त आय का प्रमुख माध्यम भी हैं, मानसून के दौरान इनकी बिक्री से कई परिवारों को अच्छी आमदनी होती है, यही वजह है कि इन्हें छत्तीसगढ़ के जंगलों का ‘ग्रीन गोल्ड’ भी कहा जाता है,
बोड़ा, फुटू और खेकसी केवल मौसमी सब्जियां नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध वन संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पहचान हैं, सीमित समय के लिए मिलने वाली ये वन उपज स्वाद, पोषण और प्रकृति का अनोखा संगम प्रस्तुत करती हैं, यही कारण है कि हर मानसून में लोग इनके बाजार में आने का इंतजार करते हैं और कीमत चाहे 1000 रुपये किलो तक पहुंच जाए, इनके शौकीनों की संख्या कम नहीं होती.

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