बस्तर दशहरा: बस्तर दशहरा की काछनगादी रस्म संपन्न, 12 साल की पीहू दास ने बेल के कांटों के झूले पर झूलकर दी उत्सव की अनुमति
बस्तर दशहरा: विश्व प्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा पर्व के दौरान शनिवार रात जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में अत्यंत महत्वपूर्ण ‘काछनगादी’ की रस्म पूरी की गई. मान्यता है कि यह परंपरा करीब 618 साल पुरानी है, जिसके तहत काछनदेवी से दशहरा पर्व मनाने की आधिकारिक अनुमति मांगी जाती है. इस वर्ष पनका समाज की पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली 12 वर्षीय बालिका पीहू दास पर काछनदेवी सवार हुईं, जिन्होंने बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झूलकर उत्सव के आयोजन की अनुमति प्रदान की.

22 पीढ़ियों से कांटों का झूला तैयार कर रहा है एक परिवार
काछनगादी की रस्म में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों से सुसज्जित झूला इस पूरी परंपरा का एक अहम हिस्सा है. लामनी गांव के रहने वाले जगत राम नेताम का परिवार पिछले करीब 22 पीढ़ियों से इस अनोखे झूले को तैयार करने की जिम्मेदारी निभाता आ रहा है. परिवार के सदस्य पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर यह झूला तैयार करते हैं, और इस दौरान उनके घर में नौ दिनों तक अखंड दीप भी प्रज्वलित किया जाता है.

रैला देवी की पूजा और आगामी जोगी बिठाई की रस्म
काछनगादी की रस्म संपन्न होने के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का विधान भी पूरा किया गया, जिसे देखने के लिए बस्तर संभाग के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचे थे. काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद अब सोमवार को कलश स्थापना के साथ पारंपरिक ‘जोगी बिठाई’ की रस्म निभाई जाएगी, जिसके साथ ही बस्तर दशहरा के अगले चरण के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाएंगे.
