CG News: कोदो-कुटकी: पारंपरिक फसलें बनीं आधुनिक ‘सुपर फूड’, किसानों के लिए बढ़ा लाभ
CG News: छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कृषि विरासत में कोदो और कुटकी जैसी लघु धान्य फसलों का विशेष स्थान रहा है। आज बदलती जलवायु, बढ़ती पोषण आवश्यकताओं और किसानों की आय बढ़ाने की जरूरत के बीच ये फसलें फिर से चर्चा में हैं। विशेषज्ञ इन्हें भविष्य की सुरक्षित और लाभकारी खेती के रूप में देख रहे हैं, कोदो (पास्पलम स्क्रोबिकुलेटम) और कुटकी (पैनिकम सुमाट्रेंस) लंबे समय से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के भोजन का हिस्सा रही हैं। ये फसलें कम पानी, कम लागत और सीमित संसाधनों में भी आसानी से उगाई जा सकती हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

कम लागत, अधिक संभावनाएं
इन फसलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें कम उपजाऊ, पथरीली और ढालू भूमि में भी उगाया जा सकता है। जहां अन्य फसलें अच्छा उत्पादन नहीं दे पातीं, वहां कोदो-कुटकी किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो रही हैं, कोदो में प्रोटीन, आयरन और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जबकि कुटकी फाइबर और खनिज तत्वों से भरपूर होती है। विशेषज्ञों के अनुसार ये फसलें मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप और एनीमिया जैसी समस्याओं में सहायक हो सकती हैं। इसी कारण इन्हें अब ‘सुपर फूड’ के रूप में पहचान मिल रही है।
सरकारी समर्थन से बढ़ा उत्साह
छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2026 के लिए कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,200 रुपये प्रति क्विंटल और कुटकी का 3,350 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। इससे किसानों में इन फसलों की खेती को लेकर उत्साह बढ़ा है, वर्ष 2025 में प्रदेश में कोदो लगभग 39.02 हेक्टेयर और कुटकी 38.03 हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई गई। उत्पादन के अनुसार कोदो का कुल उत्पादन 21.46 टन और कुटकी का 25.67 टन दर्ज किया गया, जो इन फसलों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
आधुनिक तकनीक से बेहतर उत्पादन
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार समय पर बुवाई, बीजोपचार, कतार पद्धति, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण जैसे उपाय अपनाकर कोदो-कुटकी की उत्पादकता को और बढ़ाया जा सकता है, मिलेट आधारित उत्पादों की बढ़ती मांग और सरकारी प्रोत्साहन के चलते कोदो-कुटकी अब केवल स्थानीय फसल नहीं रही। ये राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना रही हैं और किसानों के लिए बेहतर आय का साधन बन रही हैं।
