Jashpur News: कस्तूरा में क्यों विराजे भगवान जगन्नाथ, रियासतकालीन परंपरा और 1400 जलस्रोतों से जुड़ी है अद्भुत कहानी
Jashpur News: जशपुर जिले के दुलदुला विकासखंड के ग्राम कस्तूरा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा आज भी रियासतकालीन परंपराओं के साथ धूमधाम से निकाली जाती है, 16 जुलाई गुरुवार को होने वाली इस ऐतिहासिक रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचेंगे, कस्तूरा का यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक अनोखी ऐतिहासिक कहानी भी जुड़ी हुई है,

1400 जलस्रोतों की जांच के बाद चुनी गई थी जगह
मान्यता है कि जशपुर रियासत के तत्कालीन राजा विशुन प्रताप सिंहदेव ने भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों को स्थापित करने के लिए पूरे क्षेत्र के जलस्रोतों की खोज कराई थी, बुजुर्गों के अनुसार राजा ने करीब 1400 जल स्रोतों का निरीक्षण करवाया, जिसके बाद कस्तूरा गांव की एक ढोडी को भगवान के निवास के लिए चुना गया,
स्वप्न में मिला था भगवान के स्थान का संकेत
कस्तूरा मंदिर के सेवक भागवत राम के अनुसार, उनके पूर्वज और जशपुर के राजपुरोहित रामचंद्र पौराणिक ने बताया था कि पुरी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां जशपुर लाने के बाद राजा को एक दिव्य स्वप्न आया था, स्वप्न में भगवान ने संकेत दिया कि वे जशपुर नगर में नहीं रहेंगे, बल्कि पक्कीडांड़ी का भूमिगत जल जिस स्थान पर धरती से बाहर निकलेगा, वहीं उनका स्थान होगा,

दाल के छिलकों से खोजा गया भगवान का स्थान
राजा ने स्वप्न की बात राजदरबार में बताई, इसके बाद पक्कीडांड़ी क्षेत्र में पानी के बाहरी स्रोत का पता लगाने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया गया, पानी के बहाव को जानने के लिए दाल के छिलके डाले गए, इसके बाद पूरे जशपुर रियासत के 1400 जल स्रोतों की जांच की गई, आखिरकार कस्तूरा की ढोडी में वही दाल के छिलके मिले, जिसके बाद राजा ने यहां घास फूस का मंदिर बनवाकर भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना कराई,
पुरी मंदिर की तर्ज पर बना है कस्तूरा मंदिर
कस्तूरा का जगन्नाथ मंदिर पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की शैली पर बनाया गया है, हालांकि इसका आकार छोटा है, यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा पूरे विधि विधान से की जाती है, हर साल रथयात्रा के दौरान आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं,
हर साल तैयार होता है नया लकड़ी का रथ
कस्तूरा की रथयात्रा की सबसे खास बात यह है कि यहां हर वर्ष भगवान के लिए नया लकड़ी का रथ तैयार किया जाता है, ग्रामीण जनसहयोग से लकड़ियां जुटाते हैं और मिलकर रथ का निर्माण करते हैं, इसके बाद श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचकर मौसीबाड़ी तक ले जाते हैं,
राजपरिवार के बिना अधूरा माना जाता है अनुष्ठान
कस्तूरा मंदिर की रथयात्रा में आज भी जशपुर राजपरिवार की विशेष भूमिका रहती है, परंपरा के अनुसार राजपरिवार के सदस्य हर साल यहां पहुंचकर विशेष पूजा अर्चना करते हैं, भगवान का श्रृंगार और धार्मिक अनुष्ठान पूरा करने के बाद राजपरिवार के सदस्य ही मूर्तियों को अपने हाथों से उठाकर रथ तक लेकर जाते हैं,
सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रशासन अलर्ट
ऐतिहासिक रथयात्रा और मेले में उमड़ने वाली भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं, कस्तूरा की यह रथयात्रा आज भी आस्था, इतिहास और रियासतकालीन परंपराओं का अनोखा संगम बनी हुई है, जहां भगवान जगन्नाथ के प्रति लोगों की गहरी श्रद्धा देखने को मिलती है,



