CG News: बस्तर दशहरा में कुटुंब जात्रा की रस्म पूरी, 200 से अधिक नए देवी-देवता हुए शामिल
CG News: छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की 75 दिनों तक चलने वाली परंपरा में शनिवार को कुटुंब जात्रा की रस्म विधि-विधान के साथ पूरी की गई. इस दौरान बस्तर संभाग के दूर-दराज के गांवों से पर्व में शामिल होने पहुंचे हजारों देवी-देवताओं के छत्र, डोली और प्रतीकों को सम्मानपूर्वक विदाई दी गई. जगदलपुर के गंगामुंडा वार्ड स्थित देवगुड़ी में आयोजित इस रस्म में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति के प्रतिनिधि शामिल हुए. इस बार की कुटुंब जात्रा खास रही, क्योंकि बस्तर दशहरा में 200 से अधिक नए देवी-देवताओं ने हिस्सा लिया. इनमें इंद्रावती नदी के पार स्थित अबूझमाड़ क्षेत्र के देवी-देवता भी शामिल रहे.

कुटुंब जात्रा में निभाई गई सदियों पुरानी परंपरा
बस्तर दशहरा में कुटुंब जात्रा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. इस परंपरा के तहत संभाग के अलग-अलग गांवों के देवी-देवताओं को दशहरा पर्व में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है. पर्व की समाप्ति पर उनके छत्र, डोली और प्रतीकों को पूरे सम्मान के साथ विदाई दी जाती है. शनिवार को जगदलपुर के गंगामुंडा वार्ड स्थित देवगुड़ी में इसी परंपरा का निर्वहन किया गया. बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति की ओर से देवी-देवताओं के साथ पहुंचे पुजारियों को रसूम भेंट की गई. इसमें कपड़े, रुपये और मिठाइयां शामिल थीं. रियासतकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जाती है.
अबूझमाड़ के देवी-देवताओं की भागीदारी रही खास
इस वर्ष बस्तर दशहरा में 200 से अधिक नए देवी-देवताओं की भागीदारी चर्चा का विषय रही. बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, इंद्रावती नदी के पार स्थित अबूझमाड़ क्षेत्र के देवी-देवता भी इस बार पर्व में शामिल हुए. बताया गया कि नक्सलवाद के कारण पहले इस क्षेत्र के देवी-देवताओं का बस्तर दशहरा में पहुंचना मुश्किल होता था. इस बार वहां से बड़ी संख्या में देवी-देवताओं के शामिल होने के बाद कुटुंब जात्रा के दौरान उन्हें पारंपरिक तरीके से विदाई दी गई. उनकी भागीदारी को बस्तर की सांस्कृतिक परंपराओं और विभिन्न क्षेत्रों के बीच आपसी जुड़ाव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालुओं ने दी बलि
कुटुंब जात्रा के दौरान मन्नत पूरी होने पर बलि देने की परंपरा भी निभाई गई. गंगामुंडा वार्ड स्थित देवगुड़ी में श्रद्धालुओं ने अपनी मान्यताओं के अनुसार बकरा, मुर्गा, कबूतर और बतख की बलि दी. इसके बाद पर्व में शामिल देवी-देवताओं के पुजारियों को सम्मानपूर्वक विदाई दी गई. यह रस्म बस्तर की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और लोक आस्थाओं से जुड़ी हुई है.
जनजातीय संस्कृति और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि क्षेत्र की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है. कुटुंब जात्रा के माध्यम से पर्व में शामिल होने वाले देवी-देवताओं और उनके प्रतिनिधियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. हजारों देवी-देवताओं की भागीदारी और अबूझमाड़ क्षेत्र से नए देवी-देवताओं के आगमन ने इस वर्ष की रस्म को खास बना दिया. इस परंपरा के जरिए बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की निरंतरता भी देखने को मिलती है.


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