Special Story: 75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा, रावण दहन नहीं बल्कि माँ दंतेश्वरी की आराधना है खास पहचान
Special Story: छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा देश के सबसे अनूठे सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है. लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व माँ दंतेश्वरी के प्रति आस्था, जनजातीय परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक है. देश के दूसरे हिस्सों में दशहरे पर रावण दहन किया जाता है, लेकिन बस्तर में यह पर्व स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा और सदियों पुराने धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जाना जाता है.
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, स्थानीय परंपराओं को प्रोत्साहन और पर्यटन के विस्तार पर जोर दे रही है. इस वर्ष बस्तर दशहरे के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता को लेकर भी तैयारियां की जा रही हैं.
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बस्तर दशहरे का ऐतिहासिक महत्व
बस्तर दशहरे की परंपरा का संबंध ऐतिहासिक राजपरिवार और माँ दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा है. मान्यता है कि राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में इस महापर्व को विशेष विस्तार मिला. धीरे-धीरे यह आयोजन राजपरिवार तक सीमित न रहकर पूरे बस्तर अंचल की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान बन गया.
इस पर्व में विभिन्न जनजातीय समुदायों, ग्रामीणों, पारंपरिक पदाधिकारियों और स्थानीय देवी-देवताओं की अहम भूमिका होती है. यही वजह है कि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप है.

75 दिनों तक चलती हैं परंपरागत रस्में
बस्तर दशहरे की शुरुआत हरेली अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से होती है. इस रस्म में पवित्र लकड़ी और रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाले औजारों की पूजा की जाती है. इसके बाद कई पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ महापर्व आगे बढ़ता है.
काछिनगादी: काछिन देवी की आराधना कर पर्व और रथ संचालन के लिए पारंपरिक अनुमति लेने की रस्म निभाई जाती है.
जोगी बिठाई: उत्सव के निर्विघ्न समापन की कामना के साथ तपस्या और साधना की परंपरा निभाई जाती है.
रथ परिक्रमा: विशाल लकड़ी के रथ को श्रद्धालु और ग्रामीण मिलकर खींचते हैं. यह सामूहिक एकता और जनभागीदारी का प्रतीक है.
मावली परघाव: दंतेवाड़ा से आने वाली माँ दंतेश्वरी की डोली और धार्मिक प्रतीकों का पारंपरिक स्वागत किया जाता है.
निशा जात्रा: रात के समय देवी आराधना से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान होता है.
मुरिया दरबार: यह परंपरा जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक पदाधिकारियों को एक मंच पर लाकर संवाद और सामुदायिक सहभागिता का अवसर देती है.
इन रस्मों की अपनी धार्मिक और सामाजिक महत्ता है, जो बस्तर दशहरे को देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती है.

मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता
बस्तर दशहरे के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की 23 अक्टूबर को प्रस्तावित सहभागिता को देखते हुए प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं. आयोजन से पहले कमिश्नर डोमन सिंह, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने माँ दंतेश्वरी मंदिर, सिरहासार भवन और लालबाग मैदान का निरीक्षण किया.
अधिकारियों ने मंच निर्माण, बैरिकेडिंग, सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और आम नागरिकों की सुविधाओं से जुड़े कार्य समय पर पूरे करने के निर्देश दिए. सिरहासार भवन में मुरिया दरबार की बैठक व्यवस्था और लालबाग मैदान में प्रस्तावित आमसभा तथा सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित प्रदर्शनी की तैयारियों की भी समीक्षा की गई.
राष्ट्रपति की प्रस्तावित सहभागिता से बस्तर दशहरे और मुरिया दरबार की ऐतिहासिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है.

माँ दंतेश्वरी की आराधना है पर्व का केंद्र
बस्तर दशहरे में माँ दंतेश्वरी के प्रति लोगों की गहरी श्रद्धा देखने को मिलती है. स्थानीय देवी-देवताओं, ग्राम देवताओं और पारंपरिक मान्यताओं को इस उत्सव में विशेष महत्व दिया जाता है. यहाँ की धार्मिक परंपराएँ प्रकृति, समुदाय और आध्यात्मिक विश्वासों के बीच गहरे संबंध को दर्शाती हैं.
पर्व की तैयारियों से लेकर अलग-अलग अनुष्ठानों के आयोजन तक स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी रहती है. इस तरह बस्तर दशहरा जनजातीय अस्मिता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक बना हुआ है.

सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर जोर
बस्तर दशहरे जैसी परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और बुनियादी सुविधाओं का विकास भी जरूरी है. राज्य सरकार की ओर से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय परंपराओं को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है.
उत्सव से जुड़ी व्यवस्थाओं और पर्यटन सुविधाओं को बेहतर बनाने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है. इससे छोटे व्यापारियों, हस्तशिल्पियों, परिवहन सेवाओं और पर्यटन से जुड़े लोगों के लिए अवसर बढ़ने की संभावना है.

बस्तर दशहरा पसरा से स्थानीय कारोबार को बढ़ावा
बस्तर की संस्कृति को व्यापक मंच देने में स्थानीय बाजारों, हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की अहम भूमिका है. जगदलपुर में बस्तर दशहरा पसरा जैसी सुविधाएँ स्थानीय व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं.
बस्तर का डोकरा शिल्प, टेराकोटा, काष्ठ शिल्प और दूसरी पारंपरिक कलाएँ क्षेत्र की रचनात्मक विरासत का हिस्सा हैं. इन उत्पादों को पर्यटकों और बड़े बाजारों तक पहुँच मिलने से स्थानीय कारीगरों की आजीविका को सहारा मिल सकता है. साथ ही पारंपरिक कौशल को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में भी मदद मिलती है.

मुरिया दरबार में परंपरा के साथ जनसंवाद
मुरिया दरबार बस्तर दशहरे की प्रमुख परंपराओं में से एक है. इसमें अलग-अलग गाँवों और समुदायों के प्रतिनिधि एक मंच पर आते हैं. पारंपरिक पदाधिकारियों और जनजातीय समाज की भागीदारी के माध्यम से स्थानीय मुद्दों, अपेक्षाओं और सामाजिक सरोकारों को सामने रखने का अवसर मिलता है.
इस परंपरा की खासियत यह है कि यह सांस्कृतिक उत्सव को जनसंवाद से जोड़ती है. इसमें सामाजिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक सहभागिता की झलक मिलती है. मुरिया दरबार बस्तर के सामाजिक जीवन में संवाद और सामूहिक निर्णय की परंपरा के महत्व को भी रेखांकित करता है.

पर्यटन के माध्यम से बस्तर को व्यापक पहचान
बस्तर दशहरा देश-विदेश के पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति को करीब से जानने का अवसर देता है. लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव, विशाल रथ, पारंपरिक वेशभूषा, लोककलाएँ और धार्मिक रस्में इसे सांस्कृतिक पर्यटन के लिहाज से विशिष्ट बनाती हैं.
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बेहतर संपर्क सुविधाएँ, पर्यटक मार्गदर्शन, स्वच्छता, सुरक्षा और सांस्कृतिक स्थलों की जानकारी महत्वपूर्ण है. पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय खानपान, आवास, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े कारोबार को भी प्रोत्साहन मिल सकता है.

परंपरा और विकास का संगम
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय जीवन दर्शन का अनूठा उदाहरण है. माँ दंतेश्वरी की आराधना से लेकर रथ परिक्रमा और मुरिया दरबार तक, इस महापर्व की हर परंपरा स्थानीय समाज की आस्था और सामूहिक भागीदारी को दर्शाती है.
सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण, पारंपरिक कला-शिल्प को प्रोत्साहन और पर्यटन सुविधाओं का विकास बस्तर की पहचान को व्यापक बनाने में सहायक हो सकते हैं. बस्तर दशहरा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और स्थानीय विकास के नए अवसर तैयार करने का माध्यम भी है.

