Special Story: छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक गढ़ मल्हार में 75 साल पुरानी अनूठी परंपरा, रावण दहन के बाद सोनपत्र देकर गले मिलकर दूर की जाती हैं पुरानी रंजिशें
Special Story: छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक गढ़ मल्हार में दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं बल्कि आपसी बैर-भाव भुलाकर भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला उत्सव है, जहां मल्हार सहित आसपास के 50 गांवों के लोग पुरानी रंजिश भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं.
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पातालेश्वर महादेव को सबसे पहले अर्पण
मल्हार के दशहरे की मुख्य विशेषता इसकी धार्मिक परंपरा है, जिसमें रावण दहन के बाद बैगा परिवार द्वारा लाई गई शमी वृक्ष की पत्तियों यानी सोनपत्र को सबसे पहले भगवान पातालेश्वर महादेव को अर्पित कर नगर की खुशहाली की कामना की जाती है.

1950 से शुरू हुई थी परंपरा
इस भव्य आयोजन की शुरुआत वर्ष 1950 में पंडित मनराखनलाल पांडेय ने नरियरा के एक कुशल बढ़ई से रावण का पुतला बनवाकर की थी, जो समय के साथ जनभागीदारी और आसपास के गांवों की सक्रिय उपस्थिति से मल्हार की सांस्कृतिक पहचान बन गया है.
सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल
मल्हार के इस दशहरे में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण भी देखने को मिलता है, जहां स्थानीय मुस्लिम परिवार और ग्राम जुनवानी के लोग हिंदू भाइयों को शमीपत्र देकर स्वागत करते हैं तथा अपने घरों में दही-बड़ा खिलाते हैं.
