CG News: केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को दिया आमंत्रण
CG News: छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में आयोजित होने वाले 75 दिवसीय ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने के लिए नई दिल्ली में एक विशेष प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की, इस दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और प्रदेश के संस्कृति व पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने राष्ट्रपति को इस गौरवशाली जनजातीय उत्सव में पधारने हेतु औपचारिक निमंत्रण पत्र सौंपा, इस मुलाकात को राज्य की अद्वितीय लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नया सम्मान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.

सोशल मीडिया पर साझा की जानकारी
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने इस गरिमामयी मुलाकात का विवरण सोशल मीडिया पर साझा करते हुए बताया कि बस्तर दशहरा सदियों पुरानी आस्था, अनूठी लोकपरंपराओं और सामाजिक सहभागिता का अप्रतिम संगम है, उन्होंने बताया कि महामहिम राष्ट्रपति ने इस आमंत्रण को सहर्ष स्वीकार करते हुए कार्यक्रम में शामिल होने का प्रयास करने का आश्वासन दिया है, राष्ट्रपति की इस सकारात्मक प्रतिक्रिया से पूरे बस्तर संभाग में उत्साह की लहर दौड़ गई है.
प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे प्रमुख जनप्रतिनिधि
नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस गरिमामयी बैठक के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के साथ बस्तर सांसद महेश कश्यप तथा संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के सचिव डॉ. एस. भारतीदासन मुख्य रूप से मौजूद रहे, मंत्री राजेश अग्रवाल ने इस अवसर को अत्यंत स्मरणीय बताते हुए कहा कि देश की शीर्ष संवैधानिक प्रमुख को बस्तर की महान सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ना पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का क्षण है.
75 दिनों तक चलने वाले पर्व की विशेष परंपराएं
विश्वविख्यात बस्तर दशहरा अपनी अनूठी जनजातीय परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जो लगभग 75 दिनों की लंबी अवधि तक चलता है, इस ऐतिहासिक पर्व का शुभारंभ सावन महीने की हरियाली अमावस्या से होता है और यह अश्विन मास तक विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक विधानों के साथ आयोजित किया जाता है, इस पूरे समय में बस्तर का अंचल पारंपरिक संगीत, लोकनृत्य और धार्मिक अनुष्ठानों से गुंजायमान रहता है.
रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित
अन्य स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरा पर्व के विपरीत बस्तर दशहरा में रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता है, यह उत्सव असत्य पर सत्य की विजय के बजाय बस्तर की कुलदेवी मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना और समृद्ध आदिवासी संस्कृति को समर्पित है, ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार इस गौरवशाली उत्सव की शुरुआत 15वीं शताब्दी में काकतीय राजवंश के प्रतापी राजा महाराजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में हुई थी, जो आज भी अपनी मौलिकता के साथ निरंतर जारी है.

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