Success Story: धान की जगह नाशपाती, सेब और काजू की खेती से मुनाफा, दिल्ली-यूपी तक पहुँचे जशपुर के फल
Success Story: छत्तीसगढ़ के उत्तरी वनांचल क्षेत्रों में कृषि का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जहाँ कभी सिर्फ धान और पारंपरिक फसलों तक सीमित रहने वाले जनजातीय किसान अब उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों के जरिए आर्थिक समृद्धि की नई इबारत लिख रहे हैं. जशपुर, बलरामपुर और सूरजपुर जिलों में नाशपाती, काजू, सेब, स्ट्रॉबेरी, आम और लीची की व्यावसायिक खेती अब किसानों के लिए आय का मजबूत जरिया बन चुकी है.

बढ़ी जशपुर के फलों की मांग
नाबार्ड, रीड्स और राज्य उद्यानिकी विभाग के तकनीकी व वित्तीय सहयोग से उत्पादित ये ताजे फल अब स्थानीय बाजारों के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के बड़े फल बाजारों में अपनी खास पहचान बना रहे हैं. मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले जशपुर में यह बदलाव सबसे अधिक दिखाई दे रहा है, जहाँ अकेले 7,800 किसान काजू और 3,500 किसान नाशपाती की खेती से जुड़े हुए हैं.
सेब और स्ट्रॉबेरी से खुली आमदनी की नई राह
जशपुर के ठंडे इलाकों में सेब की खेती भी उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है, जहाँ वर्ष 2023 से शुरू हुए प्रयोग के तहत अब तक 410 किसान करीब 410 एकड़ में सेब के बाग तैयार कर चुके हैं. इसके अलावा जिले में 4,500 लीची उत्पादक और 50 से अधिक स्ट्रॉबेरी उत्पादक भी बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं स्थानीय किसान शेडनेट हाउस और बहुफसली मॉडल अपनाकर लाखों की कमाई कर रहे हैं.

बलरामपुर और सूरजपुर में ‘वाड़ी’ योजना से बदली जिंदगी
बलरामपुर के शंकरगढ़ ब्लॉक में करीब एक हजार किसान यूरोपीय किस्म की नाशपाती पैदा कर रहे हैं, जबकि राजपुर में एक हजार एकड़ में आम-अमरूद के बाग विकसित किए गए हैं. सूरजपुर के प्रतापपुर और प्रेमनगर विकासखंडों में नाबार्ड की वाड़ी विकास योजना के तहत लगभग एक हजार जनजातीय परिवारों को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, जिस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि नकदी फसलों की ओर बढ़ता रुझान जनजातीय क्षेत्रों में समृद्धि के नए द्वार खोल रहा है.


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