CG News: बस्तर के पाथरी गांव में मिले सैकड़ों प्राचीन शिवलिंग, खुदाई से खुल सकते हैं पुराने राज
CG News: जगदलपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर बकावंड ब्लॉक का करपावंड क्षेत्र अपने ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के लिए जाना जाता है. इसी क्षेत्र में स्थित पाथरी गांव, जिसे पुराने समय में पार्वतीपुरम के नाम से भी जोड़ा जाता है, अपने जंगलों में मौजूद सैकड़ों शिवलिंगों के कारण चर्चा में है. ग्रामीणों के अनुसार, जंगल के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय से शिवलिंग दिखाई देते रहे हैं. अब इनमें से कई शिवलिंगों को मंदिरों में स्थापित कर पूजा-अर्चना की जा रही है.
जंगल में जगह-जगह दिखाई देते हैं शिवलिंग
स्थानीय लोगों का कहना है कि पाथरी के जंगलों में केवल शिवलिंग ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर ईंटों के पुराने टीले भी मौजूद हैं. इससे क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को लेकर उत्सुकता और बढ़ जाती है. ग्रामीणों के अनुसार, पहले यहां बड़ी संख्या में शिवलिंग खुले स्थानों पर मौजूद थे, लेकिन बाहर से आने वाले कुछ लोग इन्हें उठाकर ले गए. स्थानीय लोगों का दावा है कि कई शिवलिंग दूसरे क्षेत्रों और ओडिशा तक भी ले जाए गए.

पार्वती मंदिर भी बना आस्था का केंद्र
पाथरी में शिवलिंगों के साथ देवी पार्वती से जुड़ा मंदिर भी मौजूद है. स्थानीय जानकारी के अनुसार, शिक्षक नेपाल सिंह दिल्लीवार ने यहां पार्वती मंदिर की स्थापना कराई थी. मंदिर में स्थापित देवी की प्रतिमा स्थानीय स्तर पर तैयार कराई गई है. शिव और शक्ति से जुड़ी मान्यताओं के कारण यह क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है.
प्राचीन राजवंश से जुड़ा हो सकता है इतिहास
स्थानीय लोगों का मानना है कि कभी इस क्षेत्र में शिव और शक्ति की उपासना करने वाले किसी राजवंश का प्रभाव रहा होगा. पूर्व सरपंच मंगलूराम कश्यप के अनुसार, यदि पाथरी क्षेत्र में व्यवस्थित पुरातात्विक खुदाई की जाए, तो यहां के अतीत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं. पुराने ईंटों के अवशेष और बड़ी संख्या में शिवलिंग इस संभावना को और मजबूत करते हैं कि यह क्षेत्र कभी किसी प्राचीन धार्मिक या सांस्कृतिक केंद्र का हिस्सा रहा होगा.
पूरे बस्तर में मिलते हैं प्राचीन शिव स्थल
पाथरी अकेला ऐसा स्थान नहीं है, जहां बस्तर में जंगलों के बीच प्राचीन शिव प्रतीक मिले हों. संभाग के अलग-अलग इलाकों में रियासतकालीन और पुराने शिव मंदिर मौजूद हैं. कई स्थानों पर जंगलों के बीच शिवलिंग या प्रतिमाएं मिलने के बाद ग्रामीणों ने वहां मंदिरों का निर्माण कराया. ऐसे कई स्थल आज स्थानीय आस्था और पर्यटन के केंद्र बन चुके हैं.
खुदाई से खुल सकते हैं इतिहास के अनसुलझे राज
इतिहासकार और पुरातत्व से जुड़े जानकारों के अनुसार, पाथरी का पुराना नाम पार्वतीपुरम से जुड़ा हुआ बताया जाता है और इसका ऐतिहासिक महत्व गंभीर अध्ययन की मांग करता है. यहां मिले शिवलिंग और देवी पार्वती की प्रतिमा के साथ पुराने ईंटों के अवशेष भी महत्वपूर्ण संकेत माने जा सकते हैं. हालांकि, इस क्षेत्र में वैज्ञानिक तरीके से पुरातात्विक सर्वे और खुदाई होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यहां किस काल या किस राजवंश का प्रभाव था.
आस्था के साथ पुरातत्व की भी बड़ी संभावना
पाथरी गांव आज ग्रामीण आस्था और प्राचीन विरासत, दोनों का अनोखा संगम दिखाई देता है. जंगलों में बिखरे शिवलिंग, पुराने निर्माण के अवशेष और पार्वती मंदिर इस क्षेत्र को खास बनाते हैं. अगर विशेषज्ञों की निगरानी में यहां पुरातात्विक जांच और खुदाई होती है, तो संभव है कि बस्तर के इतिहास से जुड़े कई नए तथ्य सामने आएं और पाथरी को एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल के रूप में नई पहचान मिले.
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