CG News: रायपुर की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी, लाठियां खाईं पर तिरंगा नहीं छोड़ा
CG News: डॉ. राधाबाई को रायपुर की प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों में गिना जाता है. उनके पास मेडिकल की डिग्री या पीएचडी नहीं थी, लेकिन गरीब महिलाओं की सेवा और उनके प्रति समर्पण ने उन्हें सम्मान दिलाया. 1875 में नागपुर में जन्मी राधाबाई महज नौ साल की उम्र में विधवा हो गई थीं. वर्ष 1918 में वे रायपुर पहुंचीं और नगर पालिका में दाई के रूप में काम शुरू किया.

गांधी से मुलाकात ने बदली जिंदगी
गरीब और जरूरतमंद महिलाओं की मदद करते हुए राधाबाई की पहचान पूरे रायपुर में बनने लगी. वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के रायपुर आगमन के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया. वे चरखा और स्वदेशी अपनाने के साथ विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, शराबबंदी, अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान और महिला जागरूकता से जुड़ गईं. उन्होंने घर-घर जाकर महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया.
लाठीचार्ज के बीच भी तिरंगा नहीं छोड़ा
वर्ष 1930 की एक घटना राधाबाई के संघर्ष की सबसे बड़ी पहचान बनी. सत्याग्रहियों को अमरावती जेल से रायपुर लाए जाने पर वे महिलाओं के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचीं. उनके हाथ में तिरंगा और सत्याग्रहियों के लिए भोजन था. अंग्रेज अधिकारियों ने नाराज होकर लाठीचार्ज कराया. राधाबाई पर भी जमकर लाठियां बरसीं, लेकिन उन्होंने तिरंगा अपने हाथ से नहीं छोड़ा. 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्होंने महिलाओं के जुलूस का नेतृत्व किया और गिरफ्तार होकर छह महीने की सजा भी भुगती.
भारत छोड़ो आंदोलन तक रहीं सक्रिय
जेल जाने के बावजूद राधाबाई का हौसला कम नहीं हुआ. वे आगे भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी रहीं और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी सक्रिय भूमिका निभाई. उनका जीवन सेवा, साहस और सामाजिक बदलाव की कोशिशों से जुड़ा रहा. उन्होंने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 2 जनवरी 1950 को उनका निधन हुआ, लेकिन रायपुर में उनके योगदान की पहचान आज भी बनी हुई है.
उनके नाम पर रखा गया कॉलेज
राधाबाई की स्मृति को सम्मान देने के लिए रायपुर में संचालित गर्ल्स कॉलेज का नाम वर्ष 2012 में डॉ. राधाबाई के नाम पर रखा गया. वर्ष 1986 में शुरू हुए इस कॉलेज का शुरुआती दौर अपने भवन के बिना गुजरा, बाद में मठपारा में इसका भवन तैयार हुआ. इस तरह डॉ. राधाबाई का नाम शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से भी जुड़ गया. उनका जीवन बताता है कि बिना किसी औपचारिक उपाधि के भी सेवा, साहस और जनहित के काम से समाज में बड़ी पहचान बनाई जा सकती है.



