CG News: पलाश फूल बना ग्रामीण आजीविका का मजबूत आधार, बढ़ रही आय और समृद्धि
CG News: पलाश (टेसू/ढाक) का फूल सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए आय और आजीविका का मजबूत साधन बन चुका है। इसके नारंगी-लाल फूल, जिन्हें “जंगल की आग” भी कहा जाता है, वसंत ऋतु में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देते हैं।
औषधीय और सांस्कृतिक महत्व
पलाश (Butea monosperma) का उपयोग आयुर्वेद में चर्म रोग, पेट के कीड़े, डायबिटीज और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। इसके फूलों से प्राकृतिक होली रंग और त्वचा देखभाल उत्पाद भी बनाए जाते हैं, जिससे इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

कटघोरा वनमंडल में बढ़ता संग्रहण
छत्तीसगढ़ के कटघोरा वनमंडल में पलाश फूल का संग्रहण लगातार बढ़ रहा है। पसान, केन्दई, जटगा, एतमानगर, चौतमा और पाली जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़े हैं। मार्च-अप्रैल में होने वाला संग्रहण ग्रामीणों के लिए प्रमुख आय का स्रोत बन चुका है।
बढ़ती कीमत और बेहतर लाभ
पलाश फूल की कीमत में भी लगातार वृद्धि हुई है। जहां पहले 900 रुपये प्रति क्विंटल मिलता था, वहीं अब यह बढ़कर 1600 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। इससे संग्राहकों को उनकी मेहनत का बेहतर मूल्य मिल रहा है।
संग्राहकों को सीधा फायदा
वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से संग्रहण कार्य को संगठित किया गया है। वर्ष 2025-26 मंा 20 संग्राहकों को कुल 87,400 रुपये का भुगतान किया गया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
ग्रामीण रोजगार का बड़ा जरिया
पलाश के पत्तों से बने पत्तल-दोने और फूलों से बने हर्बल रंग ग्रामीण रोजगार का बड़ा साधन बन रहे हैं। महिलाएं भी इससे जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं और अपनी आय बढ़ा रही हैं, पलाश फूल धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इसे मां लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है और पूजा में उपयोग किया जाता है। आज यही फूल ग्रामीणों के लिए आत्मनिर्भरता और समृद्धि की नई कहानी लिख रहा है।



