CG News: 1942 में बिलासपुर में गूंजी आजादी की हुंकार, टाउन हॉल पर उतरा यूनियन जैक और लहराया तिरंगा
CG News: 1942 का दौर देश के इतिहास में निर्णायक समय था. महात्मा गांधी के करो या मरो के आह्वान पर देशभर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन तेज हो चुका था. भारत छोड़ो आंदोलन की यह लहर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर तक भी पहुंची. शहर का ऐतिहासिक टाउन हॉल उस दौर की एक ऐसी घटना का गवाह बना, जब आजादी के दीवानों ने अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती देने का फैसला किया.

गुप्त बैठक में बनी थी रणनीति
8 अगस्त की रात बिलासपुर में कुछ क्रांतिकारियों ने गुप्त बैठक कर आंदोलन की रणनीति तैयार की. इसमें नगरपालिका अध्यक्ष कुंजबिहारी अग्निहोत्री, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, एलएन चित्तावर, राजेश्वर राव कोन्हेर, बच्चूभाई पटेल और डायाभाई कुशाल भाई पटेल समेत कई प्रमुख लोग शामिल हुए. तय किया गया कि सभी अलग-अलग रास्तों से निकलेंगे और एक निश्चित समय पर टाउन हॉल पहुंचेंगे. पुलिस की निगरानी से बचने के लिए बैठक से एक-एक कर निकलने की रणनीति अपनाई गई.
तीन रैलियों ने बदला शहर का माहौल
9 अगस्त की सुबह बिलासपुर में तीन प्रमुख स्थानों से रैलियां निकलीं. गांधी प्रतिमा चौक, पंडित देवकीनंदन दीक्षित चौक और तिलकनगर से निकली रैलियां आगे चलकर एकजुट हो गईं. पंडित देवकीनंदन दीक्षित चौक पर पुष्पा देवरस, गिरिजा देवी अग्निहोत्री और एलएन चित्तावर की पत्नी के नेतृत्व में महिलाओं ने आंदोलनकारियों का स्वागत किया. इसके बाद महिलाएं भी रैली में शामिल हो गईं और भारत माता के जयकारों से पूरा शहर गूंज उठा.
टाउन हॉल पर लहराया तिरंगा
रैली जब टाउन हॉल पहुंची, तो आंदोलनकारियों ने वहां लहरा रहे यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहराने का फैसला किया. कुछ ही देर में नौजवान हाथों में तिरंगा लेकर टाउन हॉल की छत पर पहुंच गए. उन्होंने यूनियन जैक को नीचे उतार दिया और उसकी जगह राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया. टाउन हॉल के सामने कलेक्टोरेट होने के कारण अंग्रेजी प्रशासन को इस घटना की जानकारी मिलते ही पूरे इलाके में पुलिस बल तैनात कर दिया गया.
लाठियां बरसीं, लेकिन हौसला नहीं टूटा
तिरंगा फहराने के बाद आंदोलनकारी पीछे नहीं हटे और उन्होंने पुलिस का सामना किया. अंग्रेजी प्रशासन की ओर से लाठीचार्ज किया गया, जिसमें कई नेताओं को चोटें आईं और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. इसके बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों का हौसला नहीं टूटा. जेल में भी उनका संकल्प कायम रहा कि वे आखिरी सांस तक आजादी की लड़ाई जारी रखेंगे. बिलासपुर का टाउन हॉल आज भी उस संघर्ष, साहस और देशभक्ति की ऐतिहासिक गाथा का गवाह माना जाता है.
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