CG News: रायपुर साहित्य उत्सव: बाल साहित्य की भूमिका पर सजीव परिचर्चा, शिक्षा में इसकी अहमियत पर जोर
CG News: रायपुर साहित्य उत्सव के तीसरे दिन कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप में बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर परिचर्चा आयोजित की गई, यह सत्र प्रसिद्ध साहित्यकार नारायण लाल परमार को समर्पित रहा, परिचर्चा में साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के अध्यक्ष डॉ. गोपाल दवे और बाल साहित्यकार बलदाऊ राम साहू मुख्य वक्ता रहे, कार्यक्रम के सूत्रधार एस के बिसेन थे.
नए बाल साहित्यिक ग्रंथों का विमोचन
कार्यक्रम में तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया,
• देवभोग के कृष्ण कुमार अजनबी की बाल कविता संग्रह “आंखों का तारा”
• ओमप्रकाश जैन की पुस्तक “जीवन चक्र”
• संतोष कुमार मिरी की पुस्तक “जीवन बोध”
विज्ञानसम्मत बाल साहित्य जरूरी: डॉ. गोपाल दवे
डॉ. गोपाल दवे ने कहा कि, बाल साहित्य का पाठक स्वयं निर्णय नहीं लेता, न ही खुद खरीददार होता है, उन्होंने बताया कि, एक समय था जब बच्चे बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर पालकों से बाल साहित्य खरीदने की जिद करते थे, उन्होंने कहा कि, आज बच्चों को सरल और सटीक साहित्य पढ़ाना आवश्यक है, डॉ. दवे ने बच्चों के लिए विज्ञानसम्मत बाल साहित्य की रचना को अनिवार्य बताया और पालकों से अपील की कि, बच्चों को बाल साहित्य के साथ हिंदी शब्दकोश भी दें, ताकि किसी शब्द का अर्थ न समझ आए तो वह उसे ढूंढ सके.
बाल साहित्य के बिना शिक्षा अधूरी
बलदाऊ राम साहू ने कहा कि, बाल साहित्य बच्चों को गढ़ता है, उन्हें विचार देता है, बाल साहित्य के बिना शिक्षा की कल्पना संभव नहीं है, यदि बाल साहित्य को पाठ्यपुस्तक से निकाल दिया जाए तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी, उन्होंने चिंता जताई कि, आज बच्चों में पढ़ने की परंपरा कम हो रही है और बाल पत्रिकाएं बंद हो रही हैं.
संस्कार और संवेदनशीलता की पाठशाला
बलदाऊ राम साहू ने कहा कि, बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सद्विचारों और मूल्यों का संग्रह है, यह बच्चों को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाता है, उन्होंने बताया कि, बाल साहित्य बच्चों के लिए भाषा संस्कार की पाठशाला है और इसे पढ़ने के लिए बच्चों को प्रेरित करना जरूरी है.
पंचतंत्र-हितोपदेश की कहानियाँ गायब हो रही हैं
सूत्रधार एस के बिसेन ने कहा कि, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि, धीरे-धीरे पुस्तकों से पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी कहानियाँ गायब हो रही हैं, उन्होंने कहा कि, बाल साहित्य नैतिक शिक्षा का मूल आधार है और बच्चों में संस्कार और व्यवहार का निर्माण करता है.



