CG News : रायपुर साहित्य उत्सव 2026: स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य का स्मरण
CG News : रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के पहले दिन देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य का सम्मान किया गया। ‘स्मृति शेष स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल : साहित्य की खिड़कियां’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य, प्रशासन, पत्रकारिता और फिल्म जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर विचार साझा किए।

छत्तीसगढ़ और हिंदी साहित्य का योगदान
डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और साहित्यकार, ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे 1973 से लगातार विनोद कुमार शुक्ल से जुड़े रहे। उन्होंने बताया कि पिछले 200 वर्षों में छत्तीसगढ़ ने हिंदी साहित्य को बार-बार नई दिशा दी है। ठाकुर जगमोहन सिंह, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय और विनोद कुमार शुक्ल जैसे साहित्यकारों ने इसे समृद्ध किया। डॉ. त्रिवेदी ने बताया कि शुक्ल का लेखन पूरी तरह मौलिक था और उनके उपन्यासों में ‘घर’ मानवीय प्रतीक के रूप में उभरता है।

मानवता के पुजारी
नई दिल्ली की युवा कथाकार एवं पत्रकार आकांक्षा पारे ने कहा कि कई लोग शुक्ल की रचनाओं को कठिन मानकर खारिज कर देते हैं, लेकिन पाठकों के लिए ये गहरी और आत्मीय लगाव पैदा करती हैं। उन्होंने कहा कि शुक्ल मनुष्यता के पुजारी थे, और उनकी रचनाएं लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं।
सरल जीवन और खुशहाल अनुभव
जनसंपर्क विभाग के उप संचालक और युवा साहित्यकार सौरभ शर्मा ने कहा कि शुक्ल का साहित्य यह सिखाता है कि सामान्य जीवन जीते हुए भी मनुष्य खुश रह सकता है। उन्होंने बताया कि शुक्ल के साथ बिताया समय सुकून देने वाला था और उनके साहित्य में ‘स्मृति’ का उपयोग पाठकों में कौतुक और उत्सुकता जगाता है।

प्रतीक और अनुभव
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और लेखक अनुभव शर्मा ने कहा कि शुक्ल की रचनाओं में प्रतीक और बिंब हर जगह दिखाई देते हैं। ‘पेड़ों का हरहराना, चिड़ियों का चहचहाना’ जैसे छोटे-छोटे संकेत जीवन के अनुभवों को परत-दर-परत उजागर करते हैं। उनकी कथाएं मिट्टी से उपजी हुई भाषा में अपनी बात कहती हैं।
साहित्य से जुड़ी व्यक्तिगत यादें
अभिनेत्री टी.जे. भानु ने साझा किया कि शुक्ल की कविताएं उन्हें बचपन से संबल देती रही हैं। उनका कहना था कि उनकी किताबों में जनमानस की सच्ची और आत्मीय बातें समाहित हैं। वे हर वर्ष 1 जनवरी को शुक्ल के जन्मदिन पर रायपुर आती थीं और उनसे मिलती थीं।
साहित्य की अनेक खिड़कियां
परिचर्चा की सूत्रधार डॉ. नीलम वर्मा ने समापन करते हुए कहा कि स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य अनेक खिड़कियों से भरा हुआ है। उनके लेखन में मानवीय करुणा और संवेदना समाई हुई है। यह सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को जोड़ता है।



