Special Story: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा और मुंडा बाजा की अनूठी परंपरा, जानिए इस पारंपरिक वाद्ययंत्र का इतिहास
Special Story: दुनिया भर में अपनी अनूठी संस्कृति और 75 दिनों तक चलने वाले लंबे आयोजनों के लिए विख्यात बस्तर दशहरा कई ऐसी प्राचीन परंपराओं को अपने भीतर समेटे हुए है, जो इसे देश के अन्य सभी धार्मिक उत्सवों से पूरी तरह अलग बनाती हैं, इन्हीं खास परंपराओं में ‘मुंडा बाजा’ का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है, जिसकी गूंज सीधे तौर पर मां दंतेश्वरी की आराधना और भक्ति से जुड़ी हुई है, बाजुओं के नीचे दबाकर बजाए जाने वाले इस पारंपरिक वाद्ययंत्र की थाप पर आदिवासी युवक देवी के मनमोहक लोकगीत गाते हैं, इसकी उत्पत्ति, इसका नामकरण और इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण हैं.

शिवना की लकड़ी और बकरे की चमड़ी से तैयार होता है पारंपरिक मुंडा बाजा
मुंडा बाजा बस्तर का एक बेहद प्राचीन और पारंपरिक वाद्ययंत्र है, जिसे मुख्य रूप से शिवना की लकड़ी और बकरे की चमड़ी का उपयोग करके तैयार किया जाता है, इसके निर्माण में स्थानीय शिल्पकारों की अद्भुत कारीगरी और नक्काशी साफ तौर पर देखने को मिलती है, इसे बजाने के लिए संगीतकार इसे अपनी बाजुओं के नीचे गोल आकार में फंसाते हैं, पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में सिर पर पगड़ी और गले में गमछा पहने युवकों का दल जब मुंडा बाजा बजाते हुए मां दंतेश्वरी के लोकगीत गाता है, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है, बस्तर दशहरा के दौरान इस वाद्ययंत्र की उपस्थिति पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है.
मुंडा बाजा की उत्पत्ति और रथ खींचने की ऐतिहासिक मान्यता
इस वाद्ययंत्र की उत्पत्ति से जुड़ी कहानी के बारे में स्थानीय जानकारों का कहना है कि रियासतकाल में जब राजा पुरुषोत्तम देव वारंगल से बस्तर आए थे, तब उनके साथ मुंडा जाति के लोग भी आए थे, जो ताली बजाकर देवी की पूजा करते थे, बाद में तालाब के पास मिले एक मेंढक की चमड़ी और मिट्टी के पात्र के प्रयोग से इसका प्रारंभिक रूप तैयार किया गया, जिसे बाद में हल्बा जाति के युवा मानसाय ने लकड़ी और बकरे की चमड़ी से और अधिक परिष्कृत किया, बस्तर दशहरा के दौरान एक बार भारी बारिश के कारण जब मां दंतेश्वरी का रथ कुम्हड़ाकोट में फंस गया था और तमाम कोशिशों के बावजूद बाहर नहीं निकल रहा था, तब मुंडा बाजा की धुन गूंजने पर लोगों में ऐसा उत्साह आया कि रथ आसानी से निकल गया, इस घटना के बाद राजा ने इस वाद्ययंत्र को चांदी का मुकुट पहनाकर सम्मानित किया था और इसे डूबडुबी बाजा से बदलकर मुंडा बाजा नाम दिया.
पोटानार गांव के कलाकारों द्वारा निभाई जा रही है सदियों पुरानी परंपरा
बस्तर दशहरा में आज भी यह परंपरा पूरी श्रद्धा और तल्लीनता के साथ निभाई जाती है, हर साल पोटानार गांव से लगभग 30 युवा और बुजुर्ग कलाकार मुंडा बाजा लेकर विशेष रूप से जगदलपुर पहुंचते हैं, ये सभी मां दंतेश्वरी की छत्र-छाया और डोली को पारंपरिक गीत गाते हुए तथा मुंडा बाजा की धुन के साथ रथ पर सुशोभित करते हैं, रथ परिक्रमा पूरी होने के बाद वे अत्यंत आदर के साथ छत्र को वापस मंदिर तक पहुंचाते हैं, वरिष्ठ पत्रकारों और संस्कृतिविदों का भी मानना है कि मुंडा बाजा केवल एक साधारण वाद्ययंत्र नहीं है, बल्कि यह बस्तर की मूल आदिवासी संस्कृति, गहरी धार्मिक आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक है.


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