CG News: जांजगीर-चांपा की अमिता श्रीवास ने माउंट एवरेस्ट फतह कर रचा इतिहास, संघर्ष से शिखर तक पहुंची बेटी
CG News: जांजगीर-चांपा जिले के चांपा के लोहारपारा की रहने वाली अमिता श्रीवास ने अपनी मेहनत और मजबूत इरादों के दम पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है. साधारण सैलून संचालक जैतराम श्रीवास की बेटी अमिता ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट, 8,848 मीटर, पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया. 22 मई 2026 को शिखर पर पहुंचने के बाद उन्होंने सुरक्षित वापसी की. उनका यह अभियान आर्थिक चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों के बीच हासिल की गई बड़ी सफलता के रूप में सामने आया है.

अभ्यास से शुरू हुआ पर्वतारोहण का सफर
अमिता का पर्वतारोहण का सफर आसान नहीं रहा. वे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर पर काम करते हुए अपने सपने को पूरा करने की तैयारी करती रहीं. वर्ष 2018 में उन्होंने पर्वतारोहण का बेसिक कोर्स पूरा किया और इसके बाद सिक्किम से एडवांस ट्रेनिंग हासिल की. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा और कई बार सुबह तड़के ट्रेनिंग की. उनकी लगन और क्षमता को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार तथा छत्तीसगढ़ राज्य पावर जनरेशन कंपनी ने एवरेस्ट अभियान के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई.
किलिमंजारो फतह कर पहले ही रचा था इतिहास
एवरेस्ट से पहले भी अमिता श्रीवास ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई थी. 8 मार्च 2021 को उन्होंने अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर तिरंगा फहराया था. इस उपलब्धि के साथ उन्हें राज्य की पहली महिला अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोही होने का गौरव मिला. किलिमंजारो के बाद एवरेस्ट को लक्ष्य बनाकर उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी. आर्थिक परेशानियों और सीमित सुविधाओं के बावजूद उन्होंने बड़े पर्वतारोहण अभियान के लिए खुद को लगातार तैयार किया.
6500 मीटर पर मौसम बना बड़ी चुनौती
माउंट एवरेस्ट का अभियान अमिता के लिए बेहद कठिन और जोखिम भरा रहा. 9 अप्रैल को शुरू हुए अभियान के दौरान करीब 6,500 मीटर की ऊंचाई पर खराब मौसम, तेज बर्फीली हवाओं और ऑक्सीजन की कमी ने मुश्किलें बढ़ा दीं. इस दौरान उनकी टीम के दो सदस्यों की मौत भी हो गई. ऐसे हालात के बावजूद अमिता ने अपना हौसला बनाए रखा. शेरपा दावा ग्यालजिन के सहयोग से वह आगे बढ़ती रहीं और करीब 21 घंटे की लगातार चढ़ाई के बाद एवरेस्ट के शिखर तक पहुंचने में सफल हुईं.
फ्रॉस्टबाइट और ऑक्सीजन की कमी से जूझकर लौटीं
शिखर पर तिरंगा फहराने के बाद अमिता के लिए वापसी भी किसी चुनौती से कम नहीं थी. नीचे उतरते समय उन्हें ऑक्सीजन की भारी कमी और फ्रॉस्टबाइट जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. करीब 42 दिनों के कठिन अभियान के बाद वह बेस कैंप तक पहुंचीं. इसके बाद उनकी हालत को देखते हुए उन्हें काठमांडू में इलाज के लिए भर्ती कराया गया. अमिता की कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति और लगातार मेहनत के दम पर बड़े से बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

