CG News: बस्तर का बदलता चेहरा, चांदामेटा नक्सलियों के गढ़ से सामान्य जीवन की ओर
CG News: बस्तर जिले का आखिरी गांव चांदामेटा कभी नक्सलियों का हेडक्वार्टर रहा, दरभा ब्लॉक का यह सुदूर इलाका, जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित है, दो साल पहले तक यह धुर नक्सली गढ़ माना जाता था,कोलेंग के आगे जाने से लोग डरते थे, करीब 25 साल पहले यहां 360 परिवार रहते थे, लेकिन नक्सली कैंप और जबरन भर्ती की कोशिशों के चलते अधिकांश परिवार पलायन को मजबूर हो गए.
भौगोलिक रणनीति और नक्सली कैंप
नक्सलियों ने चांदामेटा की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाते हुए अपना सुरक्षित गढ़ बनाया, यह गढ़ छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्रप्रदेश – तीनों राज्यों के नक्सलियों का साझा हेडक्वार्टर हुआ करता था,पहाड़ों के ठीक पीछे ही ओडिशा और आंध्रप्रदेश की सीमाएं होने के कारण सुरक्षाबलों की हलचल होते ही नक्सलियों को आसानी से दूसरे राज्य में भागने में सुविधा मिलती थी.

15 एकड़ में ट्री-गार्ड बेस कैंप स्थापित
नक्सलियों ने लगभग 15 एकड़ में ट्री-गार्ड बेस कैंप स्थापित किया, अपने मारे गए साथियों की स्मृति में 31 से 40 आम के पौधे लगाए गए, जिनके चारों ओर मोटी बल्लियों से सुरक्षा घेरा बनाया गया, आज भी मैदानी इलाके में खड़े ये आम के पेड़ उस दौर की कहानी बयां करते हैं, जब ग्रामीण भय और प्रताड़ना के बीच जीने को मजबूर थे.
परिवर्तन और ग्रामीणों की पहल
सीआरपीएफ का कैंप खुलने के बाद नक्सली अपने ठिकाने छोड़कर चले गए, आज गांव वाले खुद इन आम के पौधों की देखभाल कर रहे हैं, ग्रामीणों का कहना है कि, नक्सलियों ने उन्हें बहुत सताया, लेकिन ये पेड़ एक अच्छा काम हैं, फल तो आखिरकार गांव के लोग ही खाएंगे, पौधों से हमें कोई दुश्मनी नहीं.
नक्सली स्मारक की याद
पटनमपारा मार्ग पर विशाल नक्सली स्मारक आज भी मौजूद है, बताया जाता है कि, यह स्मारक मल्ला नाम के युवक का है, जो नाट्य मंडली से जुड़ा था और नक्सल संगठन में शामिल होने के महज एक साल बाद मुठभेड़ में मारा गया, यह स्मारक अब भी उस हिंसक रास्ते की याद दिलाता है, जिस पर कई युवाओं को धकेला गया.




