CG News:“साहित्य समाज को जगाता है और शासन को संवेदना देता है” – कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह
CG News: रायपुर साहित्य उत्सव के ‘लाला जगदलपुरी मंडप’ में आज एक अद्भुत संगम देखने को मिला, यहाँ मंच पर साहित्यकार नहीं, बल्कि वे चेहरे थे जिन्होंने दशकों तक शासन की बागडोर संभाली, कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह की सूत्रधारिता में पूर्व आईएएस अधिकारियों ने “शासन और साहित्य” के अंतर्संबंधों पर एक ऐसी चर्चा छेड़ी, जिसने लोकतंत्र में आलोचना और संवेदना के महत्व को रेखांकित कर दिया.
जब राजनीति फिसलती है, साहित्य संभालता है
चर्चा की शुरुआत करते हुए कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने साहित्य और शासन को एक-दूसरे का पूरक बताया, उन्होंने वीरगाथा काल से लेकर भक्तिकाल तक के उदाहरण देते हुए कहा,
• साहित्य की शक्ति: यदि साहित्य केवल प्रशंसा में डूब जाए तो वह अपनी शक्ति खो देता है,
• शासन की मर्यादा: यदि शासन केवल नियंत्रण पर उतारू हो जाए तो वह कठोर और अलोकतांत्रिक हो जाता है,
• लोकतंत्र का आधार: सच्ची लोकतांत्रिक ताकत वही है, जहाँ साहित्य की ‘आलोचना’ को सुना जाए और उसे जनहित की ‘नीति’ में बदला जाए.

पूर्व प्रशासनिक दिग्गजों ने साझा किए वैश्विक प्रसंग
चर्चा में शामिल पूर्व आईएएस अधिकारियों ने विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों और ऐतिहासिक घटनाओं के जरिए अपनी बात रखी,
• डॉ. सुशील त्रिवेदी: उन्होंने ‘दिनकर’ को उद्धृत करते हुए कहा कि, जब राजनीति अपना रास्ता भटकती है, तब साहित्य ही उसे सही दिशा दिखाता है, उन्होंने याद दिलाया कि स्वतंत्रता संग्राम के कई बड़े नेता मूलतः साहित्यकार ही थे,
• बीकेएस रे: उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल का जिक्र किया, जिन्होंने दार्शनिक सार्त्र को गिरफ्तार करने से यह कहकर मना कर दिया था कि, “हम इस सदी के वाल्तेयर को गिरफ्तार नहीं कर सकते,” यह साहित्य की सर्वोच्च सत्ता का प्रमाण है,
• डॉ. संजय अलंग: उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की ‘नमक का दरोगा’ और शरद जोशी के व्यंग्य ‘जीप पर सवार इल्लियां’ का उदाहरण देते हुए बताया कि, कैसे साहित्य ईमानदारी और सिस्टम की विसंगतियों को समाज के सामने लाता है,
• इंदिरा मिश्रा: उन्होंने तसलीमा नसरीन के संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि, साहित्य सच बोलने का साहस देता है, चाहे उसके लिए निर्वासन ही क्यों न सहना पड़े.
स्वतंत्रता सेनानी केयूर भूषण को नमन और पुस्तक विमोचन
सत्र की शुरुआत में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय केयूर भूषण को याद कर उन्हें नमन किया गया, इस वैचारिक मंथन के साथ ही मंच से कुछ नवोदित साहित्यकारों की पुस्तकों का विमोचन भी किया गया, जो छत्तीसगढ़ के उभरते लेखन को एक नई पहचान दिलाने का प्रयास है.
संवेदनशीलता ही बेहतर प्रशासन की कुंजी
चर्चा का समापन करते हुए डॉ. गौरव सिंह ने कहा कि साहित्य मनुष्य के मनोविज्ञान को बदलता है, एक संवेदनशील पाठक ही एक बेहतर और संवेदनशील प्रशासक बन सकता है, रायपुर साहित्य उत्सव जैसे आयोजन समाज में इसी चेतना को जगाने का काम कर रहे हैं, कार्यक्रम के अंत में संयुक्त संचालक हीरा देवांगन और उप संचालक सौरभ शर्मा ने अतिथियों का सम्मान किया.



