CG News: रायपुर साहित्य उत्सव में ‘बाल साहित्य’ के महत्त्व पर चर्चा, तीन नई पुस्तकों का हुआ विमोचन
CG News: राजधानी में आयोजित ‘रायपुर साहित्य उत्सव’ के तीसरे दिन बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर गहन मंथन हुआ, कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप में आयोजित यह विशेष सत्र प्रख्यात साहित्यकार नारायण लाल परमार को समर्पित रहा, इस दौरान विशेषज्ञों ने दो टूक शब्दों में कहा कि बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए उन्हें मोबाइल से दूर कर पुनः ‘बाल साहित्य’ की ओर मोड़ना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

तीन नई कृतियों का विमोचन
उत्सव के दौरान बाल साहित्य के क्षेत्र में तीन महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया गया, जो बच्चों के मानसिक विकास में सहायक सिद्ध होंगी,
1. आंखों का तारा – कृष्ण कुमार अजनबी (बाल कविता संग्रह)
2. जीवन चक्र –ओमप्रकाश जैन
3. जीवन बोध –संतोष कुमार मिरी
बच्चों को गिफ्ट में दें हिंदी शब्दकोश: डॉ. विकास दवे
मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विकास दवे ने एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करते हुए कहा कि, बाल साहित्य का पाठक (बच्चा) खुद किताब नहीं खरीदता, यह जिम्मेदारी पालकों की है, उन्होंने कहा,
• विज्ञानसम्मत लेखन: आज के युग में बच्चों के लिए विज्ञान पर आधारित तार्किक साहित्य लिखना अनिवार्य है,
• शब्दकोश की आदत: पालकों को चाहिए कि, वे बच्चों को बाल साहित्य के साथ एक हिंदी शब्दकोश भी दें, ताकि उनकी भाषा और शब्दावली मजबूत हो सके,
• सरलता पर जोर: बच्चों को क्लिष्ट नहीं, बल्कि सरल और सुबोध साहित्य उपलब्ध कराना चाहिए.
बाल साहित्य संस्कारों की पहली पाठशाला: बलदाऊ राम साहू
वरिष्ठ बाल साहित्यकार बलदाऊ राम साहू ने शिक्षा और साहित्य के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला, उन्होंने कहा कि, बाल साहित्य मनोरंजन का साधन मात्र नहीं, बल्कि सद्विचारों का संग्रह है,
• शिक्षा का आधार: पाठ्यपुस्तकों से यदि साहित्य निकाल दिया जाए, तो शिक्षा बेजान हो जाएगी,
• बढ़ती चिंता: उन्होंने घटती पढ़ने की परंपरा और बंद होती बाल पत्रिकाओं पर चिंता व्यक्त की,
• संवेदनशीलता: एक संवेदनशील मनुष्य बनाने में कहानियों और कविताओं का बड़ा महत्व है.
पंचतंत्र और हितोपदेश की लुप्त होती कहानियों पर मंथन
परिचर्चा के सूत्रधार एस.के. बिसेन ने दुख जताते हुए कहा कि, आज की पीढ़ी की पुस्तकों से ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ जैसी नैतिक कहानियां गायब हो रही हैं, उन्होंने जोर दिया कि, बाल साहित्य ही संस्कार और व्यवहार का मूल आधार है, बिना नैतिक शिक्षा के बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है, इस सत्र ने पाठकों और साहित्यकारों को एक नई दिशा प्रदान की कि कैसे तकनीक के युग में भी किताबों की खुशबू को बच्चों तक पहुँचाया जाए.



