CG News: रायपुर साहित्य उत्सव में राष्ट्रीय मीडिया पर मंथन, पत्रकारों ने उठाए नए सवाल
CG News: रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के दूसरे दिन लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित परिचर्चा ‘राष्ट्रीय मीडिया में बहस के मुद्दे’ ने मीडिया की वर्तमान दिशा, चुनौतियाँ और संभावनाओं पर विचारों का खुला मंच प्रदान किया, सूत्रधार वरुण सखा के नेतृत्व में वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका, प्राथमिकताओं और भविष्य की जरूरतों पर खुलकर चर्चा की, यह सत्र छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय रमेश नैयर को समर्पित था.
राजनीति का बढ़ता कवरेज
वरिष्ठ पत्रकार अनिल पाण्डेय ने कहा कि, राजनीति का मीडिया के केंद्र में आना सकारात्मक संकेत है, पिछले दशक में खबरों के ट्रेंड में बड़ा बदलाव आया है, जहां पहले बॉलीवुड और सिनेमा प्रमुख विषय थे, अब राजनीति का वर्चस्व बढ़ गया है, उन्होंने सरकार से प्रेस आयोग या मीडिया आयोग के गठन की मांग की और कहा कि, समय के अनुरूप नीतियां और नियमन पत्रकारों के हितों की रक्षा कर सकते हैं, अनिल पाण्डेय ने सोशल मीडिया को प्राइम टाइम डिबेट का विषय तय करने वाला बताया और पत्रकारों के प्रशिक्षण पर जोर दिया.

नक्सलवाद की खबरें प्रमुख
वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने कहा कि, छत्तीसगढ़ से जुड़ी नक्सलवाद की घटनाओं को राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता मिलती है, लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हो रहे सकारात्मक बदलावों और विकास को अपेक्षित स्थान नहीं मिलता, उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में कमियां हो सकती हैं, लेकिन हर पांच साल में सरकार बदलने की प्रक्रिया इसे मजबूत बनाती है, अखिलेश शर्मा ने मीडिया को केवल टीवी तक सीमित नहीं मानने की बात कही और अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के महत्व पर भी जोर दिया.
जमीनी पत्रकारिता पर संकट
वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने मीडिया की व्यावहारिक चुनौतियों पर प्रकाश डाला, उन्होंने कहा कि, सूचना का सबसे बड़ा स्रोत सरकार ही है और लगातार छुट्टियों के दौरान अखबार निकालना भी मुश्किल हो जाता है, जमीनी रिपोर्टिंग खर्चीली होने के कारण घट रही है, जबकि प्रायोजित खबरें और डिबेट कम खर्च में आसान विकल्प बन गए हैं, उमेश चतुर्वेदी ने चिंता जताई कि, मीडिया संस्थान असल पत्रकारिता, अभिव्यक्ति और भाषा कौशल से भटक रहे हैं, जिससे आरोप-प्रत्यारोप बढ़ रहे हैं.
पत्रकारिता शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी
परिचर्चा में यह भी कहा गया कि, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है, लेकिन व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी है, पत्रकारिता अब खबर और समाज से जुड़ी जिम्मेदारी के बजाय कंटेंट जेनरेशन तक सिमटती जा रही है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय है.



